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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र मानुषं लोकविश्रुतम् |  ५३   क
यत्र कृष्णमृगा राजन्व्याधेन परिपीडिताः |  ५३   ख
अवगाह्य तस्मिन्सरसि मानुषत्वमुपागताः ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति