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उद्योग पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
यात्राय़ानेषु युद्धेषु लव्धप्रशमनेषु च |  ९   क
भृशं वेद महाराज यथा वेद वृहस्पतिः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति