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सभा पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् |  १७   क
समुत्थितं दुःखतरं तन्मे शंसितुमर्हसि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति