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वन पर्व
अध्याय २२८
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धृतराष्ट्र उवाच
तस्माद्गच्छन्तु पुरुषाः स्मारणाय़ाप्तकारिणः |  १७   क
न स्वय़ं तत्र गमनं रोचय़े तव भारत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति