वन पर्व  अध्याय ८३

पुलस्त्य उवाच

तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् |  ६१   क
निय़तात्मा नरः पूतो गच्छेत परमां गतिम् ||  ६१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति