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सभा पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा तु रक्षितव्येय़ं पुरी भरतसत्तम |  ३४   क
यावद्राज्ञोऽस्य नीलस्य कुलवंशधरा इति |  ३४   ख
ईप्सितं तु करिष्यामि मनसस्तव पाण्डव ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति