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वन पर्व
अध्याय ८३
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पुलस्त्य उवाच
तत्र हंसप्रपतनं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् |  ८२   क
दशाश्वमेधिकं चैव गङ्गाय़ां कुरुनन्दन ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति