सभा पर्व  अध्याय ५९

दुर्योधन उवाच

एहि क्षत्तर्द्रौपदीमानय़स्व; प्रिय़ां भार्यां संमतां पाण्डवानाम् |  १   क
संमार्जतां वेश्म परैतु शीघ्र; मानन्दो नः सह दासीभिरस्तु ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति