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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
तांस्तथा व्याकुलीकृत्य त्वरमाणो धनञ्जय़ः |  २५   क
जघान निशितैर्वाणैः सहस्राणि शतानि च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति