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द्रोण पर्व
अध्याय ८३
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सञ्जय़ उवाच
आर्ष्यशृङ्गिं ततो भीमो नवभिर्निशितैः शरैः |  १५   क
विव्याध प्रहसन्राजन्राक्षसेन्द्रममर्षणम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति