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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
एकप्राणावुभौ कृष्णावन्योन्यं प्रति संहतौ |  १०   क
पुरा यच्छ्रुतमेवासीदद्य पश्यामि तत्प्रभो ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति