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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
त्वदन्यो नेह सङ्ग्रामे कश्चिज्जीवति सञ्जय़ |  ४८   क
द्वितीय़ं नेह पश्यामि ससहाय़ाश्च पाण्डवाः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति