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द्रोण पर्व
अध्याय ८३
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सञ्जय़ उवाच
भीमस्तु समरे राजन्नदृश्ये राक्षसे तदा |  २५   क
आकाशं पूरय़ामास शरैः संनतपर्वभिः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति