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आदि पर्व
अध्याय ८४
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यय़ातिरु उवाच
संस्वेदजा अण्डजा उद्भिदाश्च; सरीसृपाः कृमय़ोऽथाप्सु मत्स्याः |  १०   क
तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वं; दिष्टक्षय़े स्वां प्रकृतिं भजन्ते ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति