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शान्ति पर्व
अध्याय ८४
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भीष्म उवाच
प्रसन्नं ह्यप्रसन्नं वा पीडितं हृतमेव वा |  ४   क
आवर्तय़ति भूय़िष्ठं तदेको ह्यनुपालितः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति