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शान्ति पर्व
अध्याय ८४
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भीष्म उवाच
धर्मार्थकामज्ञमुपेत्य पृच्छे; द्युक्तो गुरुं व्राह्मणमुत्तमार्थम् |  ५१   क
निष्ठा कृता तेन यदा सह स्या; त्तं तत्र मार्गं प्रणय़ेदसक्तम् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति