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शान्ति पर्व
अध्याय ८४
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भीष्म उवाच
एवं सदा मन्त्रय़ितव्यमाहु; र्ये मन्त्रतत्त्वार्थविनिश्चय़ज्ञाः |  ५२   क
तस्मात्त्वमेवं प्रणय़ेः सदैव; मन्त्रं प्रजासङ्ग्रहणे समर्थम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति