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शान्ति पर्व
अध्याय ८४
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भीष्म उवाच
न वामनाः कुव्जकृशा न खञ्जा; नान्धा जडाः स्त्री न नपुंसकं च |  ५३   क
न चात्र तिर्यङ्न पुरो न पश्चा; न्नोर्ध्वं न चाधः प्रचरेत कश्चित् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति