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शान्ति पर्व
अध्याय ८४
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भीष्म उवाच
आरुह्य वाताय़नमेव शून्यं; स्थलं प्रकाशं कुशकाशहीनम् |  ५४   क
वागङ्गदोषान्परिहृत्य मन्त्रं; संमन्त्रय़ेत्कार्यमहीनकालम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति