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वन पर्व
अध्याय १२६
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लोमश उवाच
अश्वमेधसहस्रं च प्राप्य धर्मभृतां वरः |  ६   क
अन्यैश्च क्रतुभिर्मुख्यैर्विविधैराप्तदक्षिणैः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति