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अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
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अग्निरु उवाच
व्रूत यद्भवतां कार्यं सर्वं कर्तास्मि तत्सुराः |  ४७   क
भवतां हि निय़ोज्योऽहं मा वोऽत्रास्तु विचारणा ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति