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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र विश्राव्य विस्पष्टं नाम राक्षसपुङ्गवः |  ९   क
आह्वय़ामास समरे लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति