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वन पर्व
अध्याय १५०
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां नद्यां महासत्त्वः सौगन्धिकवनं महत् |  २७   क
अपश्यत्प्रीतिजननं वालार्कसदृशद्युति ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति