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वन पर्व
अध्याय ८४
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वैशम्पाय़न उवाच
तं वय़ं पाण्डवं सर्वे गृहीतास्त्रं धनञ्जय़म् |  १५   क
द्रष्टारो न हि वीभत्सुर्भारमुद्यम्य सीदति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति