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वन पर्व
अध्याय ८४
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वैशम्पाय़न उवाच
भवानन्यद्वनं साधु वह्वन्नं फलवच्छुचि |  १७   क
आख्यातु रमणीय़ं च सेवितं पुण्यकर्मभिः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति