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शान्ति पर्व
अध्याय १७४
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भीष्म उवाच
आत्मनानर्थय़ुक्तेन पापे निविशते मनः |  २   क
स कर्म कलुषं कृत्वा क्लेशे महति धीय़ते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति