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वन पर्व
अध्याय ८४
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वैशम्पाय़न उवाच
विविधानाश्रमान्कांश्चिद्द्विजातिभ्यः परिश्रुतान् |  १९   क
सरांसि सरितश्चैव रमणीय़ांश्च पर्वतान् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति