वन पर्व  अध्याय ८४

वैशम्पाय़न उवाच

आचक्ष्व न हि नो व्रह्मन्रोचते तमृतेऽर्जुनम् |  २०   क
वनेऽस्मिन्काम्यके वासो गच्छामोऽन्यां दिशं प्रति ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति