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वन पर्व
अध्याय ८४
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वैशम्पाय़न उवाच
स हि वीरोऽनुरक्तश्च समर्थश्च तपोधन |  ३   क
कृती च भृशमप्यस्त्रे वासुदेव इव प्रभुः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति