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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
अथाव्रवील्लोकगुरुर्व्रह्मा लोकपितामहः |  २८   क
ममैव तान्यपत्यानि मम शुक्रं हुतं हि तत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति