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उद्योग पर्व
अध्याय ८४
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धृतराष्ट्र उवाच
सर्वमस्मिन्गृहे रत्नं मम दुर्योधनस्य च |  २१   क
यद्यदर्हेत्स वार्ष्णेय़स्तत्तद्देय़मसंशय़म् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति