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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य मुनय़स्ते विधानतः |  ४८   क
तस्माद्वेदाननुप्राप्य पुनर्धर्मं प्रचक्रिरे ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति