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द्रोण पर्व
अध्याय ८४
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सञ्जय़ उवाच
सोऽतिविद्धो वलवता राक्षसेन्द्रो महावलः |  १८   क
व्यसृजत्साय़कांस्तूर्णं स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति