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द्रोण पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणः सप्तसप्तत्या जघान निशितैः शरैः |  २   क
दुर्मर्षणो द्वादशभिर्दुःसहो दशभिः शरैः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति