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द्रोण पर्व
अध्याय ८४
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सञ्जय़ उवाच
स वध्यमानः समरे पाण्डवैर्जितकाशिभिः |  २१   क
दग्धाद्रिकूटशृङ्गाभं भिन्नाञ्जनचय़ोपमम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति