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द्रोण पर्व
अध्याय ८४
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सञ्जय़ उवाच
समुत्क्षिप्य च वाहुभ्यामाविध्य च पुनः पुनः |  २२   क
निष्पिपेष क्षितौ क्षिप्रं पूर्णकुम्भमिवाश्मनि ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति