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आदि पर्व
अध्याय ८५
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यय़ातिरु उवाच
हित्वा सोऽसून्सुप्तवन्निष्टनित्वा; पुरोधाय़ सुकृतं दुष्कृतं च |  १८   क
अन्यां योनिं पवनाग्रानुसारी; हित्वा देहं भजते राजसिंह ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति