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आदि पर्व
अध्याय ८५
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यय़ातिरु उवाच
येनाश्रय़ं वेदय़न्ते पुराणं; मनीषिणो मानसमानभक्तम् |  २७   क
तन्निःश्रेय़स्तैजसं रूपमेत्य; परां शान्तिं प्राप्नुय़ुः प्रेत्य चेह ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति