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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
प्राय़ेण हि गृहस्थस्य ममत्वं नाम जाय़ते |  २   क
सङ्गागतं नरश्रेष्ठ भावैस्तामसराजसैः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति