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शान्ति पर्व
अध्याय ८५
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वृहस्पतिरु उवाच
एतदेकपदं शक्र सर्वलोकसुखावहम् |  ४   क
आचरन्सर्वभूतेषु प्रिय़ो भवति सर्वदा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति