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शान्ति पर्व
अध्याय ८५
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वृहस्पतिरु उवाच
दानमेव हि सर्वत्र सान्त्वेनानभिजल्पितम् |  ७   क
न प्रीणय़ति भूतानि निर्व्यञ्जनमिवाशनम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति