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शान्ति पर्व
अध्याय ८५
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वृहस्पतिरु उवाच
तस्मात्सान्त्वं प्रकर्तव्यं दण्डमाधित्सतामिह |  ९   क
फलं च जनय़त्येवं न चास्योद्विजते जनः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति