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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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वसिष्ठ उवाच
देवस्य महतस्तात वारुणीं विभ्रतस्तनुम् |  २   क
ऐश्वर्ये वारुणे राम रुद्रस्येशस्य वै प्रभो ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति