वन पर्व  अध्याय १९८

व्याध उवाच

मृषावादं परिहरेत्कुर्यात्प्रिय़मय़ाचितः |  ४०   क
न च कामान्न संरम्भान्न द्वेषाद्धर्ममुत्सृजेत् ||  ४०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति