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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषमार्षभेणैव पूरितम् |  ३६   क
श्रुत्वा तु भैरवं नादमुपय़ाय़ा जवेन माम् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति