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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
वय़ं च भगवन्सर्वे जगच्च सचराचरम् |  ३१   क
तवैव प्रसवाः सर्वे तस्मादग्निर्विभावसुः |  ३१   ख
वरुणश्चेश्वरो देवो लभतां काममीप्सितम् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति