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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
निसर्गाद्वरुणश्चापि व्रह्मणो यादसां पतिः |  ३२   क
जग्राह वै भृगुं पूर्वमपत्यं सूर्यवर्चसम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति