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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
अष्टौ कविसुता ह्येते सर्वमेभिर्जगत्ततम् |  ४२   क
प्रजापतय़ एते हि प्रजानां यैरिमाः प्रजाः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति