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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
सर्वे प्रजानां पतय़ः सर्वे चातितपस्विनः |  ४७   क
त्वत्प्रसादादिमं लोकं तारय़िष्यन्ति शाश्वतम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति