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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
देवपक्षधराः सौम्याः प्राजापत्या महर्षय़ः |  ४९   क
आप्नुवन्ति तपश्चैव व्रह्मचर्यं परं तथा ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति